(मौजा ही मौजा)
Thursday, October 16, 2008
(मौजा ही मौजा)
Thursday, October 9, 2008
व्यंग्य
(बाबू जी की बाबूगीरी )
आज देश में हलचल ज्यादा है। हर तरफ़ भागमदौड़ है। पर अपने बाबू साहेब तो ऐसे हैं की उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनकी तो मौजा ही मौजा है। देश के हर सरकारी दफ्तर में लोग उनसे मिलने यूँ आते हैं ; जैसे किसी मन्दिर में अपनी मन्नत के लिए चढावा देने आते हैं। उनकी अदाओं के आगे तो बड़ी-बड़ी हीरोइने भी फेल समझो। पुरानी पिक्चरों के गाने तो देखो । कई पिक्चरों के गानों में 'बाबू' शब्द ढूँढोगे तो जरुर मिल जायेगा। क्योंकि डायरेक्टर को पता होता था की 'बाबू' शब्द में कितना झोल है। आज के डायरेक्टर तो नालायक ठहरे । 'गांधीगीरी' बना डाली। पर एक 'बाबूगीरी ' नहीं बना पाए। कोई भी सरकारी काम हो हर फाइल उनकी टेबल से होकर गुजरती है। और बगैर उनके औटोग्राफ के आगे चली जाए , तौबा - तौबा । हर बड़ा आदमी ,हर पढ़ा-लिखा और हर गरीब उनके आशीर्वाद के बिना कैसे सफल हो सकता है। इसके महत्व को सब जानते हैं। तभी तो सब मत्था टेक कर और गुरुद्क्शीना दिए बिना आगे नहीं बढ़ते। जिसने चू - चपड की नहीं की उसका बेडा गर्क समझो । ये दूसरी दुनिया के लोग होते हैं , इनके आगे तो समझो किसी का वश नहीं। इनकी कारीगीरी का तोड़ तो शायद है ही नहीं है। हर्षद मेहता ,अब्दुल करीम तेलगी जैसे दिग्गज फेल हो गए , पर इनको कोई फेल नहीं कर पाया। जनता इनसे मिलने आती है तो 'बाबू' के साथ 'जी' लगाना नहीं भूलती है। क्योंकि 'बाबू' के साथ 'जी' लगाने से इसका वजन बढ़ता है। जनता को पता है की , अपने पिताजी के साथ जी लगाओ न लगाओ पर 'बाबूजी ' के साथ 'जी' लगाओ तो वे बड़े गौरवान्वित हो जाते हैं ।बाबू साहेब का सीना चौडा हो जाता है। अमेरिका के टावर गिरे या बम धमाके हो जाए या देश के शेयर लोट- पोत हो जाए पर अपने बाबू मोशाय तो ऐसे हैं की इनका शेयर मार्केट तो कभी गिरता ही नहीं वो तो चढ़ता ही रहता है।
सरकार के पास तो काम - वाम है नहीं एक फालतू का कानून 'सूचना का अधिकार ' बना डाला । दफ्तरों में कम्पूटर लगा दिए। बस फ़िर क्या बाबू साहेब आजकल थोड़ा चिंता में घिरे रहते हैं। उन्हें तो अपने आगे कूड़ा नजर आता है। उन्हें भविष्य की चिंता होने लगी है। क्या होगा हमारी भावी पीढी का, वो हमारी तरह मौजा ही मौजा में रहेंगे या नहीं। खैर ताजा समाचार यही है की वो भी अपने विरोधियों को पटखनी देने के वास्ते रिसर्च में जुट गए हैं। और उन्होंने एलान भी कर दिया है की हम गांगुली जी तरह इतनी जल्दी हार मानने वाले नहीं हैं। वो इस सीरिज के बाद खेल या न खेले हम तो खेलते रहेंगे । जब तक जनता जनार्दन हमें समर्थन देती रहे।
Thursday, October 2, 2008
"दिलों में खटास का दौर"
आज दुनिया जितनी तेजी से बदल रही है । उतना ही लोगों का दिल और दिमाग भी बदल रहा है । हमारे देश में एक ख़ास बात है। हर जगह महफिले सज जाती है। कभी पान की दुकान, कभी सड़कों,कभी होटलों तो कहीं आफिस में चार - पाँच लोग जमा हुए नही की हर घटना पर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू। ऐसे ही एक आफिस में प्रतिक्रियाओं का दौर चल रहा था। पाकिस्तान में हुए बम धमाकों और हाल में भारत हुए धमाकों के बारे में । सबकी एक ही मिली जुली प्रतिक्रिया रही " ठीक ही तो है इस भीड़ में से दो चार और कम हो जायेंगे "
मैं दंग रह गया । शायद यह बदलते जमाने का नया संदेश है। आज लोगों के बीच बस एक बात रह गई है । " मैं और मेरे लोग " बाकी सब मरे - बचे किसी को किसी की फ़िक्र नहीं । ये वे लोग हैं जिन पर ये विपदा नहीं गुजरी है । ये वे लोग हैं जो बदलते जमाने का नया संदेश दे रहे हैं । एक पिक्चर आई है 'मुंबई मेरी जान' । मुंबई बम विश्फोतो पर आधारित इसमे जब एक दुर्घटना में एक पत्रकार एक पीड़ित व्यक्ति से यह पूछती है की आपको कैसा लगा अपने परिजनों को खोकर । फ़िर जब उसी पत्रकार जो अपने होने वाले पति को खो देती है बम विस्फोटो में , से ये सवाल पूछा जाता है तो तब उसे लगता है की ये सवाल क्या सही है या ग़लत है ।
तो कहने का मतलब है एक पीड़ित व्यक्ति का दर्द एक पीड़ित ही जानता है। वो क्या जाने जो मीलों दूर बैठ कर प्रतिक्रियाएं देते हैं। आज भोतिक्तावादी भुत ने हमें इस कदर जकड लिया है की हम किसी और के दुःख दर्दों में सरीक होना भूल चुके हैं। सामाजिक कार्यों में भाग लेना तो बहुत पुरानी बात हो चुकी है । इस आधुनिकता में आगे बढ़ने की होड़ ,पैसों की भूख ने हमारे वजूद को तहस नहस करके रख दिया है।
पैसों के बल पर दुनिया खरीदने वाले लोगों को ये पता नहीं की यहाँ हार ही हार है । क्योंकि सिकंदर , हिटलर जैसे लोग भी खाली-खाली ही लोटे थे। अगर लोगों से पूछा जाए की १३ वी - १४ वी शताब्दी के किसी धना सेठ का नाम बताओ तो वो बगल झाकने लगेंगे। लेकिन किसी संत के बारे में पूछे तो लोगों का जवाब तुंरत आएगा तुलसीदास जी ।आख़िर लोगों को ये कैसे याद है ,ये लोगों को इसलिए याद है की अच्छे विचार जो कभी दफ़न नहीं होते हमेशा फलते और फूलते ही हैं । और वे हमेशा एक पीढी से दूसरी पीढी और कई पीढियों तक सफर करते रहते हैं। लेकिन पैसों का खेल ऐसा है की आज राजा है तो कल रंक बन जाए, इसमे कोई संदेह नहीं है।
फ़िर क्यों हम इन रिश्तों में खटास पैदा कर रहे हैं। कल शायद हममें से कोई न हो ,हमें कौन याद रखेंगे। इसलिये क्यों न आज से ही कुछ मीठे-मीठे रिश्तों की शुरुआत करें । जो हमारे जाने के बाद भी हमारी यादों को मीठा-मीठा कर दे।
"बेचारा ---उत्तराखंड क्रिकेट "
आज अधिकांश राज्यों की क्रिकेट टीमे रणजी ट्राफी क्रिकेट में प्रतिनिधित्व कर रही है । ऐसे में उत्तराखंड राज्य की रणजी ट्राफी टीम का न होना राज्य के खेल प्रेमियों को हमेशा कचोटता रहता होगा। बी जे पी सरकार बड़े बड़े दावे करती है की राज्य की प्रतिभाओं को उचित अवसर मुहैया कराये जायेंगे। लेकिन सब खाक नजर आ रहा है। हमारे यहाँ प्रतिभाओं की कमी नहीं है। यहाँ की क्रिकेट प्रतिभाएं समय- समय पर दूसरे राज्यों की और पलायन करती रही है। इसका जीता जागता उदाहरण महेंद्र सिंह धोनी जैसे क्रिकेटर हैं। यहाँ की जनता जिनके दिलों में ख्वाब होता है। अपने बच्चों को एक अंतरास्तरीय क्रिकेटर बनाने का।इसके लिए वो धीरे- धीरे दूसरे राज्यों में पलायन करते रहे हैं। उत्तराखंड में कोचिंग क्लब खुले हैं। प्रतिभाएं दिन -रात मेहनत भी करती है।लेकिन क्या फायदा उनकी दिन-रात की मेहनत का जो उनको सिर्फ़ क्लब तक सिमट कर रख देती है।
क्योंकि भारतीय टीम में आपको अगर प्रतिनिधित्व करना है , तो पहले आपको रणजी क्रिकेट में प्रदर्शन करना होता है। तब जाकर आपके प्रदर्शन के बारे में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड सोचता है। माना की भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड एक नीजी संस्था है। सरकार के दिशा निर्देश यहाँ नहीं चलते । लेकिन राज्य सरकार की तरफ़ से एक कोशिश तो होनी चाहिए। उन्हें भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के समक्ष अपना पक्ष रखना चाहिए ,की हमें भी राज्य रणजी ट्राफी टीम का प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए । लेकिन न तो राज्य के मुख्यमंत्री जी और न ही खेल मंत्री जी को इसकी फ़िक्र है । खेलमंत्री जी तो केवल अपनी राजनितिक गतिविधियों में व्यस्त हैं। उन्होंने आज तक अन्य खेलों के लिए भी एक भी गंभीर प्रयास नहीं किए हैं। उन्होंने तो सुरेंदर भंडारी का नाम भी सुना हो या नहीं सुना हो । जिसने ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व किया था। और जो लगातार देश- विदेश में अच्छा प्रदर्शन कर पदक जीत रहा है। क्योंकि अभी तक न तो इस खिलाड़ी को राज्य सरकार ने पुरस्कृत किया है और न ही इसकी हौसला अफजाई की है। सुन रहे हैं न मुख्यमंत्री जी और खेल मंत्री जी ।
कब तक हमारी प्रतिभाये यूँ ही मटियामेट होती रहेंगी । और कब तक हम यूँ ही दबे- दबे रहेंगे। हमें भी तो हक़ है आगे आने का और आगे बढ़ने का और अपनी चमक से दुनिया को सराबोर करना है।
Wednesday, September 24, 2008
( नई सुबह की सुगबुगाहट )
उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में स्थित औली। दूर-दूर तक बर्फ की चादरों से फैला हुआ यह स्थल देश-विदेश से आने वाले सैलानियों को अपने अप्रितम सौंदर्य से मोहित कर देता है। उत्तराखंड में औली स्कीईंग के लिए उपयुक्त स्थल है। इसी को मद्देनजर रखते हुए इसे २००९ सैफ विंटर गेम्स की मेजबानी का अवसर प्राप्त हुआ है.
इतिहास में पहली बार उत्तराखंड को इतने बड़े अंतरास्ट्रीय आयोजन की मेजबानी का अवसर प्राप्त हुआ है। और इस मौके को सफल आयोजन में तब्दील करना राज्य सरकार, चमोली जिले और जोशीमठ नगर इन तीनो के एकजुट प्रयासों पर निर्भर रहेगा।
तैयारियों को लेकर उठा विवाद अब कुछ हद तक थम चुका है। अब उलटी गिनतियों का दौर जारी है। और सबको मिलकर इसे सफल बनाने के प्रयास आरम्भ कर देने चाहिए। क्योंकि ये गेम्स उत्तराखंड राज्य के लिए एक मील का पत्थर साबित होने जा रहे हैं। एक सफल कदम, सफलता के सौ दरवाजे खोलेगा। ये गेम्स केवल गेम्स तक सिमट कर नहीं रह जायेगा। बल्कि यहाँ के लोगों को मौका होगा अपनी संस्कृति , अपने जज्बे और यहाँ के अप्रितम सौंदर्य को देश - विदेश से आने वाले लोगों को रूबरू कराने का। आठ साल के उत्तराखंड ने सफलता के नए आयाम रचे हैं और जारी है। उससे पहले हमारी स्थती दबे - कुचले इंसान जैसी थी। मुजफर नगर कांड ने साबित भी किया की उत्तर प्रदेश सरकार हमें किस श्रेणी में रखती है। लेकिन उस घटना ने लोगों को और मजबूती दी। और आज हमें साबित करना है की इन आठ सालों में हमने अपने स्तर में सुधार के जो आयाम रचे हैं उसकी गूंज पूरे देश और विदेश में जरुर फैलनी चाहिए।
एक कहावत है की " अवसर बार- बार आपके चौखट में दस्तक नहीं देते हैं।" ये वक्त है अपना सब कुछ झोकने का , अपने युवाओं को सफलता का एक मार्ग बनाने का।
नए साल की शुरुआत के बाद पूरे देश की निगाहें आप पर होंगी। और तब--------------- क्या होगा, कैसे होगा. ये बातें पुरानी हो जायेंगी। बस सामने एक मंजिल होगी। जिसका एक ग़लत कदम राज्य की प्रतिष्ठा और आपको कई नीचे खाइयों में धकेल सकता है। और एक सफल कदम मंजिल के सैकड़ों रास्तों की दास्ताँ लिखेगा।
" क्योंकि हममें माद्दा है, जूझने का , लड़ने का।
हमने खेला है इन नदियों की लहरों में, पहाडों की गोद में।
हमने देखा है, अपने घर के सामने के पहाड़ पर चढ़ कर।
कैसा लगता है बुलंदियों के सिखर परचढ़कर। "
तो फ़िर क्या, शुरू हो जाईये------ इतिहास में अपने आपको साबित करने के लिए।
Sunday, September 14, 2008
(पंकज आडवानी )
टाइगर वूड्स ,माइकल जोर्डन ,स्टेफी ग्राफ ,रोजर फेडरर ये कुछ नाम हैं। जिन्होंने अपने- अपने खेलों में अपनी बादशाहत साबित की थी। इनके सामने इनके प्रतिध्न्धी बौने साबित होते थे और हैं। इन्ही के नक्शे कदम पर एक और सख्स चल पडा है । जिन्होंने स्नूकर और बिल्यर्डस दोनों में अपनी मास्टरी साबित कर दी है। वह सख्स है पंकज आडवानी। २४ जुलाई १९८५ को जन्मा यह सख्स दस साल की उम्र में स्नूकर क्लब जा पहुँचा और इसे टेबल और छडी का खेल इतना पसंद आया की एक के बाद एक रिकार्ड बनते चले गए । ये विचित्र संयोग की बात थी की १९९० से पहले ये पूरा परिवार कुवैत में रह रहा था । लेकिन संयोग देखिये १९९० में इराक़ ने कुवैत पर हमला बोला तो ये पूरा परिवार वहाँ से शिफ्ट होकर बेंगलोर में बस गया। १७ साल की उम्र में गीत सेठी का रिकार्ड तोड़कर सबसे कम उम्र में चैम्पीयन बने । २००३ में सबसे कम उम्र के युवा एशियाई बने जिन्होंने आईबीएसऍफ़ विश्व स्नूकर स्पर्धा जीती । २००४ में अर्जुन पुरस्कार और २००६ में राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड से इन्हे नवाजा गया । पिछले हफ्ते बेंगलोर में आयोजित ओनजीसी आईबीएसऍफ़ विश्व बिल्यर्डस खिताब ( अंक और समय दोनों फार्मेट ) दोहरी सफलता के साथ जीता ।इससे पहले २००५ में माल्टा में डबल वर्ल्ड बिलियर्ड्स खिताब ( अंक और समय )दोहरी सफलता के साथ जीता था । अभी तक इन्होने ६ वर्ल्ड खिताब और दो एशियाई बिल्यर्डस स्पर्धाये जीती है। दोहा एशियन गेम्स में देश के लिए सोने का तमगा जीतना इनके जीवन के गौरवपूरण क्षणों में से एक था । अभी जिन्दगी के सिर्फ़ २४ वसंत इन्होने देखे हैं। इतनी कम उम्र में इतना सम्मान प्राप्त करना और खिताबों की झडी लगाना वाकई इन्हे इस खेल का बादशाह साबित करती है ।
Thursday, September 11, 2008
निजी क्षेत्र जो इस समय नई बुलंदियों को छू रहा है। ऐसे में हर किसी का रुझान इस और है। युवाओं में भी इस का क्रेज है। इस क्षेत्र में सफलता, नाम और पैसा तीनो उपलब्ध है। लेकिन आपने इसके पीछे के दुसरे कटु सत्यों पर भी नजर डाली। शायद नहीं? यदि आप इसके पीछे के यथार्थ धरातल को देखे तो आप चोंके बिना नहीं रहोगे।
आज अगर हकीकत देखेंगे तो पायेंगे की इन निजी क्षेत्रों में योग्यता के आधार पर तो लोग चुने जा रहे हैं। लेकिन इन निजी क्षेत्रों में ही नौकरियों के लिए सिफारिश का चलन भी बढ़ता जा रहा है। और स्थति भयावह होती जा रही है। सिफारशी लोग जिनमे किसी का भाई, किसी के पापा, किसी के जीजा, किसी की बुवा------------------------------- ऐसे कई नाते - रिश्तेदार हैं । जो उच्च पदों पर है। वे लोग अपनी सिफारिश या दबदबे के बल पर अपने लोगों को शामिल कर लेते हैं। ऐसे में योग्य प्रतिभाएं धरी की धरी रह जाती हैं। जिनका न आगे न पीछे कोई सिफारशी गाडफादर है। वो लोग मुश्किल में पड़ जाते हैं। इंटरव्यू के लिय्रे जाते वक्त तो उनमे बड़ा उत्साह होता है। लेकिन इन्हे बेदखल कर दिया जाता है, बिना सिफारिश के। मतलब हर दामन पाक साफ़ नहीं है। दाग के छींटे कहीं न कहीं तो रहते हैं, क्योंकि ये कलयुग है। सब की तमना जवान होती है, वो चाहते हैं अच्छे रास्ते जहाँ वे मेहनत से हिला कर रख दे दुनिया को और चढ़ जाए सफलता की अनगिनत सीढियां पर। उनको यहाँ मिलती है तो जिल्लत । वो कहाँ से लाये सिफारशी प्रमाणपत्र । ऐसे में वो क्या करे? वो थके हारे रह जाते हैं। वो मजबूर हो जाते हैं। या तो वो जिन्दगी से समझौता कर लेते हैं या दबी हुई चिंगारी से एक आक्रोश का जनम होता है। जो ग़लत हाथों में पड़कर दुसरे तरीके ईजाद कर लेते हैं। और फ़िर कुछ बेरहम इंसानों के ग़लत फैसलों का फल सारी जनता को भुगतना पङता है। इन चिंगारियों का हस्र भी बुरा होता है। या तो वो पुलिस की गोलियों का निशाना बनते हैं। या फ़िर जेल उनका नया आशियाना बनती है।