Monday, September 10, 2012
durlabh vichar
Wednesday, October 26, 2011
Pyaar
डायरी के पन्नों को पलटते हुए एक बार फिर उसकी फोटो नजर आई.
एक बार फिर पुराणी यादों का फ्लाशबैक,
जैसे कल कल की ही बात हो
मोबाइल पे होने वाली रोमांस भरी बातें
दिल पे एक टिस छोड़ गयी
एक बार फिर गहरा दर्द दे गयी वो बातें
दिन भर के काम के बाद शाम को मोबाइल पे ढेर सारी बातें करना
एक अलग ही जोशे जूनून होता था, सारी थकान काफूर
वो पल वो यादें दिल में आज भी संजोये रखी
महसूस होता है बड़ी शिद्दत से, महसूस होता है
एक पल में वो आज ख़ाक हो गया, कहाँ कमी रह गयी………..
न वो झुक पाई, न मैं झुक पाया आखिर क्यों………
मैं दिखने के बाद उससे मिलने का साहस न जुटा पाया
हम ऐसे प्रेमी न बन सके जो उसकी गली में जाके, उसका पता पूछ सके
हम ऐसे प्रेमी न बन सके जो विलेन बन के, उसको अपनी बाँहों में खिंच सके
हम तो बस एक सच्चे दोस्त वाले प्रेमी ही रहे
जो उसके यादों को सिद्दत से दिल में समाये रखे हैं
प्यार में हार इसका अपना ही मजा है
ये आपको ता उम्र कतरनो में मुड़- मुड़ के पुरानी यादों की तरफ खिंच ले जाती है……..
Saturday, July 30, 2011
राजनितिक उठापटक का दौर
भारतीय राजनीती में उथल- पुथल मची है। एक ही नाम है जो भारतीय राजनीती में एक सनसनी की मानिंद अपने विचारों पर अडिग, गाँधीवादी विचारधारा के साथ और नवपरिवर्तन का पुरजोर समर्थक। वो शख्स उम्र के आखिरी पड़ाव में होते हुए भी युवा विचारों से लैस और चाहता है की बूढ़े होते सविंधान में कुछ आमूल चूल परिवर्तन जरुरी है । एक ही तो नाम है अन्ना हजारे। एक जिद जो गाँधी जी में थी और आज वही जिद अन्ना हजारे में भी दिखाई देती है। तरीका वही है अहिंसा का, बस समय का बदलाव है तब गाँधी जी देश की आजादी के लिए लड़े थे और आज अन्ना हजारे ; देश को लूट रहे अपने गध्धारों के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं। वक़्त का तकाजा भी है।आजादी के बाद से आज तक देश की बागडोर बीच के ५ से ७ वरसों को छोड़ दिया जाये तो कांग्रेस पार्टी के ही हाथ में रही है। और वो चाहते भी हैं की किसी भी तरह हो शासन हम ही चलायें। उनको फर्क नही पड़ता है देश डूबे या राजनीती करने के लिए किसी भी हथकंडे का इस्तेमाल करना हो वो इसके लिए तैयार बैठे हैं। वो एक प्रजातंत्रीय तरीके से देश नही चला रहे बल्कि वो एक राजा की तरह देश में शासन चलाना चाहते हैं। और सत्ता का केंद्र बिंदु गाँधी परिवार ही तो बन बैठा है। क़ि भैया अब इंदिरा बिटिया है , अब संजय बाबा है वो नहीं तो राजीव भैया और अब नया राग राहुल बाबा। ऐसा लग रहा है जैसे हम सोलहवीं सदी में जी रहे हैं। जैसे हम कस्ट से पीड़ित प्रजा हैं और राहुल बाबा आकर हम गरीबों का उद्धार कर देंगे। इससे घटिया स्तर और भारतीय राजनीती का क्या हो सकता है। हम गुलामी मानसिकता से ग्रस्त भारतीय समाज में जी रहे हैं। इनके लोगों की डिग्रियां उठाओ तो कहीं USA का तमगा है कहीं इंग्लैंड वगैरा- वगैरा। और तब आकर ये फाइव स्टार होटलों से देश के लोगों का भविष्य तय करते हैं। वाह रे गाँधी के देश। करते गलत अपने को हैं और नाम छोड़ जाते गाँधी जी का। ये तो भैया मोड़रेट लोग हैं। कहीं कोई दुर्घटना होती है तो भईया डिजाइनर से तैयार कपडे पहन के ही ये वहां तक आते हैं की किस समय कौन सा सूट मैच करेगा । और यही एक बुधिजीवी वर्ग का भी दृष्टिकोण बन चूका है। कांग्रेस चाहती है की देश जैसा चल रहा है वैसा ही चले कोई हमें परेशान न करे। तो उन्हें भी समझ आ जाना चाहिए की पीढियां बदल चुकी हैं । ये नव भारत है लोग शिक्षित हैं गुलामी मानसिकता अब नही चलने वाली है। और समय के हिसाब से संविधान में परिवर्तन जरुरी है क्यों की ये समय की मांग है। मैं पूरी पार्टी को कटघरे में खड़ा नहीं करना चाहता। अभी वक्त है वो पुरानी भूलों में सुधार करें। देश में बढ़ते करप्शन ,कालेधन जैसे मुद्दों पर निर्भीक और निष्पक्ष निर्णय ले। अगर आज अन्ना हजारे की सिविल सोसाइटी जनलोकपाल जैसा मसौदा ले के आ रही है और पूरे देश की जनता उनके समर्थन में है तो जरुरी है की उनको ले कर चलें ।
नहीं तो समय का क्या है “ इतिहास समय के साथ बदलता रहता है ”।
Monday, August 9, 2010
चमचे
Saturday, July 31, 2010
कठिनतम दौर
वरना तो फिर कांग्रेस डायन देश लुटवाय जात ----------------------------------------।
Thursday, February 19, 2009
" स्लमडाग मिलेनियर" एक चर्चित फ़िल्म जो पूरे वर्ल्ड में धमाल कर रही है। इस फ़िल्म की स्टोरी एक ऐसे सख्स पर केंद्रित है। जो मुंबई की झुग्गी झोपडियों में पला बढ़ा। और एक दिन वह टीवी के मशहूर गेम शो "कौन बनेगा करोड़पति" में दो करोड़ की इनामी राशी जीत लेता है। काल सेंटर में चाय देने वाला यह सख्स न तो किसी बड़े स्कूल से पढ़ा - लिखा होता है। बस उसके पास होता है तो सिर्फ़ प्रक्टिकली नालेज । इस कारनामे को अंजाम तक पहुचाने वाला सख्स का नाम "जमाल" है। यह एक सच्ची घटना पर आधारित फ़िल्म है।
ये फ़िल्म उन लोगों को एक आईने की तरह है ; जो सड़कों पर भीख मांगते , कूदों के ढेर बीनते, होटलों रेस्तरां में बर्तन धोते बच्चों को घ्रिनीत दृष्ठि से देखते हैं । गाली गलौच और मारपीट करते हैं।
आख़िर वो भी तो इंसान हैं। फ़िर अपनों और उनमे इतना फर्क क्यों करते हैं। देश के हर कोने में ऐसे मासूम दिखाई पड़ेंगे। जिनमे प्रतिभाओं की कमी नहीं है। बस उन्हें जरुरत होती है तो तराशने की अगर ऐसे लोगों को तराशा जाए तो कई "जमाल" पैदा होंगे।
आख़िर में एक बार फ़िर "स्लम डाग्स मिलेनियर" जिसने प्रतिष्टित गोल्डन ग्लोब अवार्ड जीता है। संगीतकार ए० आर० रहमान को भी संगीत के गोल्डन ग्लोब अवार्ड से नवाजा गया है।और अब आस्कर की दौड़ में है। और इस फ़िल्म को आस्कर अवार्ड मिलेगा इसमे कोई शक नहीं है। क्योंकि पिक्चर ही इतने करीने से पेश की गयी है।
तो कम आन सलाम डाग्स -------------------
हमारे देश में भी अजीबोगरीब खेल चलते रहते हैं।नामी-गिरामी लोग ऐसे खेलों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। शायद उनके बीच होड़ सी मची रहती है , सुर्खियों में बने रहने की। और एक ऐसा ही नाटकीय घटनाक्रम पिछले एक दो महीनो से जारी है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे चंद्रमोहन ( पूर्व उप मुख्यमंत्री ) जिनके तीन किसोरवय बच्चे हैं। और पूर्व विधि अधिकारी अनुराधा बलि १७ दिसम्बर को इस्लाम धर्म कबूल करके चाँदमोहम्मद और फिजा बन गए और शादी कर ली।लेकिन इस कहानी का सुखद अंत यहीं पर नहीं था बल्की कहानी आगे बढ़ती है। और चाँद मोहम्मद ; फिजा को छोड़कर फ़िर से अपनी पूर्व पत्नी सीमा के साथ हो लिए हैं। और अब अनुराधा बाली उर्फ़ फिजा न्याय की गुहार लगा रही है।
फ़िर से एक शादीशुदा राजनेता और उसके द्वारा सताई गई एक और महिला। एक और उत्पीडन।ऐसी न जाने कितनी मासूम अबलाओं को राजनेताओं ने अपनी पैसे की चमक और रुतबे की धमक से बहलाया और फुसलाया। और फ़िर मझधार में छोड़ दिया। शायद फ़िर वही कहानियाँ दोहराई जायेंगी। न्यायालयों में गुहार पे गुहार, सालों खेल चलेंगे। और ये चंद्रमोहन उर्फ़ चाँद मोहम्मद जैसे लोग मौजा ही मौजा लुटते रहेंगे। और जनता जनार्दन सिर्फ़ और सिर्फ़ ऐसी कहानियों को चटखारे - पत्त्खारे के साथ मजे ले कर पढ़ती और सुनती रहेंगी।